परमेश्वर रूपी कुम्हार मुझे गढ़ रहे हैं।
मैं कैसा पात्र बनूँगा:
ढोने, रखने या पीने के काम का?
दीपक, थाली या रसोई का सिंक?
मानती हूँ, मैं कुछ उथली-सी हूँ,
क्योंकि अपने ही बारे में सोचती बहुत हूँ।
पर एक बात ध्यान में रखो,
अकेला पात्र मैं ही नहीं हूँ।
मेरे जीवन के इर्द-गिर्द
और भी बहुत लोग हैं,
एक पति, एक बेटी,
और कुछ भाई भी हैं।
कुम्हार का हाथ उन पर भी है,
हममें से हर एक को नया बना रहा है।
एक और पात्र मुझसे टकराता है,
और अब मुझमें एक छोटी-सी गाँठ पड़ जाती है।
मैं दूसरे पात्र से जा टकराती हूँ,
लगता है अब उसमें दरार आ गई है।
फिर हम कुम्हार के चाक पर लौटते हैं,
जब तक फिर से उनमें उनका स्वरूप न दिखे।
अगर मेरे काम और मेरी कही बातें
दूसरों की मिट्टी की दिशा बदलती हैं,
तो मुझे बहुत सावधानी से आचरण करना होगा,
कहीं दूसरों के पात्र भीतर को न धँस जाएँ।
परमेश्वर की इच्छा है कि पात्र उपयोगी हों,
ऐसे जो आग की तपिश सह सकें।
बात केवल मेरी नहीं, केवल तुम्हारी नहीं;
परमेश्वर दूसरे पात्रों पर भी काम कर रहे हैं।
एलिज़ाबेथ रस्ट द्वारा
यह कविता यिर्मयाह 18:1-6 में दिए गए धर्मशास्त्र के उस अंश से प्रेरित थी।


