रात थी निस्तब्ध, हवा उदास।
एक आदमी अकेला चला; मंज़िल का न था आभास।
उसकी व्याकुल आत्मा में छिड़ा था भीषण संग्राम।
वह जीवन के चौराहे पर था, जीवन का पूरा सफ़र सामने तमाम।
वह ईश्वर में विश्वास करता था, या कम-से-कम उसे ऐसा लगता था।
जो कुछ वह जानता था—जो कुछ उसे सिखाया गया था, उसका पालन करता था।
पर कुछ ठीक नहीं, मुझमें कुछ कमी है।
जीवन को पीछे मुड़कर देखूँ, तो दूसरों की तरह ही जिया हूँ मैं।
पर मैं चर्च जाता हूँ! गाता हूँ और प्रार्थना करता हूँ!
अभी कुछ ही दिन पहले पड़ोसी की मदद भी तो की थी!
उसने मन ही मन संघर्ष किया, गलत को सही ठहराया।
ईश्वर ही काम कर रहा था, वह बहुत सामर्थी लगा।
सच तो यह है कि मुझमें आत्मविश्वास की कमी है।
मैं अपने आप पर विश्वास करता हूँ, उस पुराने समय के ईश्वर पर नहीं।
ईश्वर हर दिन मेरे जीवन में अपनी सामर्थ्य दिखाना चाहता है।
वह चाहता है कि मैं प्रमाणित होऊँ; वही जीवन और मार्ग है।
अपना पूरा भरोसा रखने के लिए उससे बेहतर कोई नहीं;
सर्वशक्तिमान ईश्वर से बढ़कर कोई नहीं। हर मनुष्य के लिए यह ज़रूरी है!
–बैरी ग्रांट द्वारा


