# विवाह का भेद

धार्मिक परिवार

भाषा: hi  
लेखक: Donald Brechbill  
Chambersburg, PA  
मूल अंक: The Heartbeat of The Remnant, वसंत 2019, संख्या 1  
मूल पृष्ठ: 4–6  
लेख पढ़ें: <https://remnant.truechristian.church/hi/परिवार/विवाह-का-भेद/>
मूल PDF: Spring\-2019\-Remnant\.pdf
[The Heartbeat of The Remnant, वसंत 2019](<https://remnant.truechristian.church/hi/issues/heartbeat-remnant-2019-spring/>)

हममें से बहुतों ने युवावस्था में आदर्श विवाह की कल्पना की है। हमने कल्पना की है कि हमारा विवाह ऐसे व्यक्ति से हो जो हमसे बिना शर्त प्रेम करे और हमारी हर विचित्रता को खुशी\-खुशी स्वीकार करे। इफिसियों 5:22\-33 में हमें ऐसा ही एक विवाह मिलता है। यहाँ प्रेरित पौलुस पति\-पत्नी के संबंध की तुलना यीशु मसीह और उनकी दुल्हन, कलीसिया के घनिष्ठ संबंध से करता है। पति\-पत्नी के संबंध से मसीह और उनकी दुल्हन के संबंध की ओर वह इतनी सहजता से बढ़ता है कि हम सोचने लगते हैं कि उसका मुख्य ध्यान किस पर था। पद 22 में वह पत्नियों को निर्देश देता है कि …*अपने\-अपने पति के ऐसे अधीन रहो, जैसे प्रभु के।* फिर पद 25 में वह पतियों को निर्देश देता है कि …*अपनी\-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके…।*

पौलुस इस अंश का सार यह कहकर प्रस्तुत करता है: *यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ। –इफि 5:32।* यह उल्लेखनीय समानता हमें विश्वास दिलाती है कि विवाह का उद्देश्य उस गहन, आत्म\-बलिदानी संबंध को पूरी तरह प्रतिबिंबित करना है जिसे मसीह ने अपने लिए दुल्हन प्राप्त करने में दिखाया। यह चित्रण इतना सामर्थी है कि हम केवल यही मान सकते हैं कि सृष्टि के समय से ही परमेश्वर ने विवाह को हमारे प्रति अपने उत्साही प्रेम को प्रतिबिंबित करने के लिए रचा।

पौलुस ने लिखा, *हे पतियो, अपनी\-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया; –इफि 5:25।* जब हम पृथ्वी पर यीशु के संक्षिप्त जीवन को देखते हैं, तो हमें दूसरों के लाभ के लिए आत्म\-बलिदान के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। स्वार्थ का कोई संकेत नहीं मिलता। अपने प्राणों को इस निःस्वार्थ रीति से अर्पित करना ही सुसमाचार को बहुतों के लिए इतना आकर्षक बनाता है।

2 कुरिन्थियों 5:14 में पौलुस ने लिखा, *क्योंकि मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है…।* यही सुसमाचार का स्वभाव है। हमारे प्रति मसीह का महान प्रेम हमें प्रत्युत्तर में उससे प्रेम करने के लिए प्रेरित करता है। इस पारस्परिक प्रेम का परिणाम भक्ति\-भाव से की गई सेवा का जीवन है, जिसे हम कभी\-कभी आज्ञाकारिता कहते हैं। यदि आप पति के रूप में ऐसी पत्नी चाहते हैं जिसे आपकी सेवा करने में आनंद आए, तो मसीह के समान प्रेम करना सीखें।

## I\. मसीह ने “बलिदानी प्रेम” से प्रेम किया

फिलिप्पियों का दूसरा अध्याय कभी\-कभी मसीह के “महान केनोसिस” के रूप में जाना जाता है। सातवें पद में आया यूनानी शब्द *kenoo* \(*परन्तु अपने आप को शून्य कर दिया*\) का अर्थ है “उण्डेल देना”। पृथ्वी पर आने में यीशु ने पिता के साथ अपने पद को त्याग दिया और पृथ्वी पर जीवन में प्रवेश किया—मानवीय दृष्टि से एक संदिग्ध गर्भधारण के द्वारा—एक विनम्र, कुंवारी, गरीब लड़की के पुत्र के रूप में। यही वह प्रतिष्ठा थी जिसे उसने अपना लिया। उसने पतित मानवता के साथ अपनी पहचान जोड़ी, जबकि उसे परमेश्वर के तुल्य होने का दावा करने का पूरा अधिकार था।

गतसमनी के बगीचे में यीशु ने “बलिदानी प्रेम” दिखाया, जब उसने *…प्रार्थना करके कहा, हे मेरे पिता, यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो। –मत्ती 26:39।* अपने जीवन और बलिदानी मृत्यु के द्वारा उसने हमें दिखाया कि संबंध में घनिष्ठता केवल तभी मिल सकती है जब हम उस संबंध में स्वयं को खो दें। हमारे समय का सबसे बड़ा अभिशाप आत्म\-प्रेम और आत्म\-मग्नता है। पौलुस ने तीमुथियुस को लिखा, *…कि अन्तिम दिनों में कठिन समय आएंगे। क्योंकि मनुष्य स्वार्थी… होंगे। –2 तीमु 3:1\-2*

हम देखते हैं कि सामाजिक नेटवर्किंग के आगमन के साथ यह भविष्यवाणी पूरी हो रही है। यद्यपि इसका दावा है कि यह लोगों के जुड़ने का मंच है, वास्तव में यह **आत्म\-प्रचार** का मंच है। स्वयं के प्रति यह आसक्ति “कठिन” है, क्योंकि यह संबंध की घनिष्ठता के विरुद्ध काम करती है और वैवाहिक संबंध में घातक हो सकती है। विवाह में घनिष्ठता इस बात पर निर्भर करती है कि दोनों व्यक्ति **अपनी निजी पहचान छोड़ने** और **एक नई साझा पहचान अपनाने** के लिए तैयार हों।

## II\. मसीह ने “विश्वासयोग्य प्रेम” से प्रेम किया

*फसह के पर्व से पहिले, जब यीशु जान गया कि उसकी घड़ी आ पहुँची है कि वह इस संसार से पिता के पास जाए, **तो उसने अपने उन लोगों से, जो संसार में थे, प्रेम किया; और अन्त तक उनसे प्रेम करता रहा।** –यूह 13:1।* मसीह ने अस्वीकार किए जाने पर भी विश्वासयोग्य प्रेम दिखाया। यूहन्ना ने लिखा कि *वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया। –यूह 1:11*

मत्ती ने लिखा, *यह सब इसलिए हुआ कि भविष्यद्वक्ताओं के वचन पूरे हों। तब सब चेले उसे छोड़कर भाग गए। –मत्ती 26:56।* उनसे प्रेम करना एक बात है जो बदले में हमसे प्रेम करते हैं। यीशु ने कहा कि चुंगी लेनेवाले भी इतना तो करते हैं। यीशु ने उनसे प्रेम दिखाया जो उससे बैर रखते थे, जिन्होंने उसे धोखा दिया, जिन्होंने उसका इन्कार किया, और उसने उन लोगों के लिए भी प्रार्थना की जिन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया। उसके प्रेम को वाचा की प्रतिबद्धता ने कायम रखा। वह *…जगत की उत्पत्ति से वध किया हुआ मेम्ना है। –प्रका 13:8।* उसने किसी भी बात को अपने अनन्त उद्देश्य के मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया।

हमारे समाज ने **वाचा** की समझ खो दी है; इसलिए हमारे यहाँ इतने टूटे हुए विवाह हैं। यहाँ तक कि उद्धार के संबंध में “वाचा\-विज्ञान” को माननेवाली अनेक कलीसियाएँ भी विवाह पर उन्हीं वाचा\-सिद्धांतों को लागू करने में विफल रहती हैं। मलाकी स्पष्ट रूप से कहता है कि विवाह एक वाचा है—*…तौभी वह तेरी संगिनी और तेरी वाचा की पत्नी है। –मला 2:14।* बाइबिल के अनुसार वाचा का प्रेम ऐसा प्रेम है जो बदले में प्रेम मिले या न मिले, बना रहता है।

वाचा के प्रेम का सबसे नाटकीय वर्णन भविष्यद्वक्ताओं में मिलता है। भविष्यद्वक्ताओं का मुख्य संदेश यह है कि एक जोशीला प्रेमी, “परमेश्वर”, अपनी विश्वासघाती पत्नी, “इस्राएल”, को पुकार रहा है कि वह उसके पास लौट आए—*…लौटो, लौटो अपनी बुरी चाल से; हे इस्राएल के घराने, तुम क्यों मरना चाहते हो? –यहे 33:11।* यशायाह ने लिखा: *जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो; दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच\-विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, और वह उस पर दया करेगा; वह हमारे परमेश्वर की ओर फिरे, और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा। –यशा 55:6\-7*

यद्यपि इस्राएल ने बार\-बार प्रभु के विरुद्ध विद्रोह किया, फिर भी हम उसके प्रति परमेश्वर के प्रेम को स्थिर और अपरिवर्तित देखते हैं। परमेश्वर अपनी वाचा की प्रतिज्ञा के प्रति विश्वासयोग्य रहा, यद्यपि उसकी दुल्हन ने विधर्मी वेदियों के आगे घुटने टेक दिए। वाचा के विश्वासयोग्य प्रेम के इसी गुण ने उद्धारकर्ता के आगमन का मार्ग बनाया। परमेश्वर ने अदन की वाटिका में एक प्रतिज्ञा की—*और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर डालूंगा; वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा। –उत्प 3:15।* लगभग चार हजार वर्ष बाद यह प्रतिज्ञा मसीह में पूरी हुई।

अपने विवाह के दिन हम “मृत्यु तक हमारा साथ न छूटे” प्रेम करने की प्रतिज्ञा करते हैं। यह प्रतिज्ञा विश्वास के साथ की जाती है। कोई नहीं जान सकता कि जीवन भर में उस प्रतिज्ञा की क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है। यदि ऐसा स्थायी, अटूट प्रेम हो जिसकी जड़ें परमेश्वर की अनन्त विश्वासयोग्यता में हों और वह हमारा साक्षी हो, तो प्रतिबद्धता के लिए उसकी कीमत अप्रासंगिक है।

## III\. मसीह के प्रेम ने दुःख को अपनाया

हमारी आत्म\-केंद्रित पीढ़ी की एक विशेषता यह विचार है कि किसी संबंध में मुझे दुःख नहीं सहना चाहिए। यह हमारे भोगवादी, सुख की खोज करनेवाले समाज की उपज है। यह हमारी ऐनाबैपटिस्ट संस्कृति में भी प्रवेश कर जाता है, क्योंकि हम अधिकाधिक समृद्ध होते जाते हैं और हमारे तथा संसार के बीच अलगाव की रेखाएँ अधिकाधिक धुंधली होती जाती हैं। इस सोच का परिणाम यह है कि हमारे युवा विवाह में यह सोचकर प्रवेश करते हैं कि “मेरा जीवनसाथी मेरी सेवा करेगा, और मैं राजकुमार या राजकुमारी की तरह रह सकूँगा।”

हमारा ऐनाबैपटिस्ट विश्वास और विरासत उन स्त्री\-पुरुषों के द्वारा आज तक सुरक्षित रहे हैं जिन्होंने समझा कि मसीह के साथ संबंध में अपना क्रूस उठाना शामिल है। ऐसे परिवारों की कहानियाँ बहुत हैं जिन्होंने सुसमाचार के लिए अपनी मातृभूमि और अपनी सारी संपत्ति छोड़ दी।

संबंध में दुःख को अपनाने की धारणा पतरस की पत्री में स्पष्ट रूप से सिखाई गई है। पतरस ऐसी कलीसिया को लिख रहा था जो उत्पीड़न की भयंकर आग सह रही थी। वह उन्हें अपने से परे किसी उद्देश्य के लिए मसीह के दुःख सहने के उदाहरण पर विचार करने को प्रोत्साहित कर रहा था। *इसलिये जब कि मसीह ने शरीर में होकर दुःख उठाया, तो तुम भी ऐसा ही मनभाव धारण करके हथियारबन्द बनो… –1 पत 4:1।* दूसरे अध्याय में पतरस लिखता है: *क्योंकि यदि कोई परमेश्वर का विचार करके अन्याय से दुःख उठाता हुआ क्लेश सहता है, तो यह सुहावना है। –1 पत 2:19।* कुछ पद बाद वह कहता है: *और तुम इसी के लिये बुलाए भी गए हो क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिये दुःख उठाकर, तुम्हें एक आदर्श दे गया है, कि तुम भी उसके चिन्ह पर चलो: –1 पत 2:21।*

दूसरे अध्याय में मसीह के दुःख सहने के उदाहरण का अनुकरण करने के लिए तत्पर रहने को कहने के बाद, पतरस तीसरे अध्याय में यह कहते हुए आगे बढ़ता है, *वैसे ही हे पत्नियो, तुम भी अपने\-अपने पति के अधीन रहो; ताकि यदि उनमें से कोई वचन न मानता हो, तो तुम्हारे भय सहित पवित्र चालचलन को देखकर बिना वचन के अपनी पत्नी के चालचलन के द्वारा जीत लिया जाए। –1 पत 3:1\-2।* भलाई करते हुए दुःख सहने को हर युग के मसीहियों ने बड़े सम्मान की बात माना है। हाल के वर्षों में ही भलाई करते हुए दुःख सहने को “दुर्व्यवहार” माना जाने लगा है। कम\-से\-कम तीन शक्तियाँ हैं जो दुःख के प्रति हमारी समझ को नकारात्मक रूप दे रही हैं।

### 1\. स्वार्थी, सुख की खोज करनेवाला समाज

एक का ऊपर पहले ही वर्णन किया जा चुका है: वह भोगवादी समाज जिसमें हम रहते हैं \(जीवन\-शैली के रूप में सुख को समर्पित समाज\)।

### 2\. स्वास्थ्य, धन और समृद्धि का सुसमाचार

दूसरी शक्ति अनेक इंजीलवादी कलीसियाओं का स्वास्थ्य, धन और समृद्धि का सुसमाचार है। इसका अर्थ यह है कि यदि हम मसीह का अनुसरण करना चुनें, तो हमारा जीवन शारीरिक कुशलता और भौतिक बहुतायत से भर जाएगा। यह समझ पुराने नियम में प्राचीन इस्राएल से की गई उस प्रतिज्ञा पर आधारित है जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहनेवाले देश का वर्णन है। हमारा विश्वास है कि यह प्रतिज्ञा कलीसिया के युग में प्रेम, आनंद, शांति आदि आत्मा के फल से भरपूर जीवन के रूप में पूरी होती है। दुःख के बीच भी इन फलों का बहुतायत से होना संभव है। वास्तव में, जब दूसरे किसी व्यक्ति के दुःख के बीच फल देखते हैं, तभी वह सबसे अधिक दिखाई देता है और सबसे अधिक सराहा जाता है।

### 3\. नारीवादी आंदोलन

आज दुःख के प्रति हमारे दृष्टिकोण को प्रभावित करनेवाला तीसरा तत्व नारीवादी आंदोलन है, जो निर्भीकता से घोषणा करता है कि किसी भी स्त्री को विवाह\-संबंध में किसी भी तरह का दुःख या अभाव नहीं सहना चाहिए। इसलिए हमारे समाज में ऐसी स्त्रियाँ हैं जिनका अपना करियर है, जो अपना वेतन स्वयं कमाती हैं और अपना बैंक खाता अलग रखती हैं। यह सारा की तरह विश्वास की स्त्रियों की गवाही से कितना भिन्न है, जिसने *…इब्राहीम की आज्ञा मानी, और उसे स्वामी कहकर पुकारा: यदि तुम भलाई करो, और किसी प्रकार के भय से भयभीत न हो, तो तुम भी उसकी बेटियाँ ठहरोगी। –1 पत 3:6*

संबंध के लाभ के लिए दुःख सहने की पहल मसीह ने की और कलीसिया के पूरे युग में हजारों विश्वासयोग्य मसीहियों ने उसका अनुकरण किया। प्रेरित पतरस के शब्द और विश्वासयोग्य मसीहियों की गवाही हमें चुनौती देते हैं कि हम दुःख को अपने विश्वास की सच्चाई के प्रमाण\-चिह्न के रूप में अपनाएँ।

## IV\. मसीह ने पवित्र करनेवाले प्रेम से प्रेम किया

हमें बनाने में परमेश्वर की योजना यह थी कि हम उसकी तरह पवित्र हों, ताकि उसके साथ घनिष्ठ संगति का अनुभव कर सकें। परन्तु मनुष्यजाति ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया, इसलिए उसने एक उद्धारकर्ता की प्रतिज्ञा की। इस बीच उसने एक वैकल्पिक योजना दी जिसका उद्देश्य मनुष्यजाति को स्वयं का विनाश करने से रोकना था, और वह था “व्यवस्था”।

फिर भी, परमेश्वर का यह अभिप्राय कभी नहीं था कि उसके साथ हमारा संबंध व्यवस्था के अधीन हो। वह हमसे प्रेम का संबंध चाहता है, इसलिए उसने अपने पुत्र को हमारे पास भेजा और अपने प्रेम से हमें अभिभूत कर दिया। अब हम उसके प्रेम का प्रत्युत्तर न्याय के भय से नहीं, बल्कि उसके प्रेरक प्रेम के प्रति प्रेमपूर्ण प्रतिक्रिया के रूप में देते हैं। यह बात रोमियों में सबसे स्पष्ट रूप से कही गई है: *क्योंकि व्यवस्था जिस काम को शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उसको परमेश्वर ने किया; अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में और पापबलि होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी \[व्यवस्था की धर्मी मांगों को पूरा किया\]; ताकि व्यवस्था की विधि हम में पूरी हो, जो शरीर के अनुसार नहीं वरन् आत्मा के अनुसार चलते हैं। –रोम 8:3\-4*

यीशु ने प्रेम के द्वारा वह पूरा किया जिसे दण्ड\-संहिता की कठोर मांगों से कभी पूरा नहीं किया जा सकता था। उसने धार्मिकता का स्तर ऊँचा कर दिया। *क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे। –मत्ती 5:20।* उसने हमें दिखाया कि कैसे जीना और कैसे प्रेम करना है। उसकी बलिदानी मृत्यु ने व्यवस्था की दण्ड\-संबंधी मांगों को पूरा किया। अपने पुनरुत्थान, स्वर्गारोहण और पवित्र आत्मा के उंडेले जाने के द्वारा उसने विश्वासियों को वैसा ही जीने और प्रेम करने की सामर्थ दी जैसा वह करता था।

पौलुस हमें विवाह में इसी प्रकार संबंध रखने की शिक्षा देता है: *हे पतियो, अपनी\-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया। कि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए। और उसे एक ऐसी तेजोमय कलीसिया बनाकर अपने पास खड़ी करे, जिसमें न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो, वरन् पवित्र और निर्दोष हो। –इफि 5:27।* यीशु अपने लिए दुल्हन प्राप्त करने पृथ्वी पर आया। वह कोई सुंदर, तेजस्वी दुल्हन नहीं थी जो उत्सुकता से उसके आने की बाट जोह रही हो। वह पाप से विकृत थी और उसके विरुद्ध विद्रोह में जी रही थी—*वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया। –यूह 1:11।* अपने धैर्यवान, निरंतर प्रेम के द्वारा उसने अपनी दुल्हन को एक तेजस्वी दुल्हन में बदल दिया, जो उसके सामने विस्मय से खड़ी होती है और आनंदपूर्वक उसकी आराधना और स्तुति करती है।

क्या आपकी पत्नी में दाग और झुर्रियाँ हैं? क्या उसके कुछ रवैये ऐसे हैं जिन्हें आप बदलना चाहते हैं? या क्या कुछ भय और असुरक्षाएँ उसकी स्वतंत्रता और आनंद में बाधा डालती हैं? आप उससे बदलाव की माँग कर सकते हैं और आपकी अपेक्षाओं पर खरी न उतरने के लिए उसे फटकार सकते हैं। यह तरीका व्यवस्था जैसा होगा। इससे उसकी सीमाएँ और अधिक उभरेंगी और उसकी चिंताएँ बढ़ेंगी। या आप उसके दाग और झुर्रियों के बावजूद उससे प्रेम कर सकते हैं। करुणा और प्रोत्साहन के शब्दों से आप उसे अपने भय से ऊपर उठने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे मसीह अपने वचन से अपनी दुल्हन को पवित्र करता है। यीशु ने दिखाया कि प्रेम वह कर सकता है जो कठोर मांगें कभी नहीं कर सकतीं। पौलुस ने सिखाया कि यह विवाह का एक मूलभूत सिद्धांत है। इसका उद्देश्य ऐसा संबंध होना है जिसमें प्रेरक शक्ति प्रेम हो।

## V\. बड़ा भेद

पौलुस ने विवाह पर अपनी विवेचना का अंत यह कहकर किया: *यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ। –इफि 5:32।* बाइबिल की भाषा में भेद कोई ऐसी बात नहीं जिसे समझा न जा सके, बल्कि ऐसी बात है जिसे केवल वे ही समझ सकते हैं जो विश्वास से सत्य को ग्रहण करके अपनाते हैं। यह सच्चे मसीहियों पर प्रकट होता है; दूसरों से छिपा रहता है।

यीशु में विश्वासियों के रूप में हमें विवाह के ऐसे दृष्टिकोण को समझने का सौभाग्य मिला है जिसे बहुत\-से लोग समझना शुरू भी नहीं कर सकते: कि बलिदानी प्रेम घनिष्ठता का द्वार खोलता है, कि वाचा का प्रेम जीवन\-भर की तृप्ति की कुंजी है, कि संबंध के लिए दुःख सहने की हमारी तत्परता हमारे प्रेम की सच्चाई प्रमाणित करती है, और अंत में, कि अपने जीवनसाथी में बदलाव लाने का सबसे प्रभावी तरीका बिना शर्त प्रेम है।

ये सिद्धांत समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं और बाइबिल पर आधारित हैं। ये सुसमाचार की नींव हैं और हमारी ऐनाबैपटिस्ट, परमेश्वर के राज्य पर आधारित धर्मशास्त्र का मूलभूत हिस्सा हैं। जहाँ इन्हें विश्वासयोग्यता से लागू किया जाता है, वहाँ ये किसी भी विवाह को बदल देंगे।

![सूर्यास्त की चमकदार पृष्ठभूमि में हाथ थामे एक पुरुष और स्त्री की छायाकृति](<https://remnant.truechristian.church/images/articles/0b10b42a-d2c7-4e0f-bf4d-62eec6c8ee11-1.jpg>)

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  <p>इस लेख का अनुवाद OpenAI (मॉडल: gpt-6-luna) द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से किया गया है और अभी इसकी मानवीय समीक्षा नहीं हुई है। अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक संस्करण है। अर्थ के बारे में संदेह होने पर कृपया अंग्रेज़ी मूल पाठ देखें। <a href="/en/family/the-mystery-of-marriage/" data-source-article-id="0b10b42a-d2c7-4e0f-bf4d-62eec6c8ee11" hreflang="en">अंग्रेज़ी मूल पाठ</a></p>
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