इसलिए, हे पवित्र भाइयो, स्वर्गीय बुलाहट में सहभागी... –इब्रानियों 3:1।
सच्ची बुद्धि धीरे-धीरे किरणों में दमकती है,
सूक्ष्म बदलावों पर ध्यान ही नहीं जाता।
बचपन के दिनों की किताबों से आगे,
वह तुम्हें उस दूर की पहाड़ी पर बुलाती है।
धीरज धर, धैर्य के पथ पर आगे बढ़...
“आगे! ऊपर! और भी ऊँचे!”
कभी उदास मन से हम खीझ उठते हैं,
प्रचंड शीत में हमारा साहस घटता है।
धरती की सम्मान-सूची में हम असफल रहे,
आशा क्षीण, इच्छाशक्ति निराश।
पर सुनो, वह गूँजती हुई घंटी...
“आगे! ऊपर! और भी ऊँचे!”
प्रलोभन उठते हैं, सुख-साधन बुलाते हैं,
वे सत्य के बदले खोखला रोमांच देते हैं।
जो झुक जाते हैं, वही गिरते हैं,
परमेश्वर की धन्य इच्छा पूरी नहीं करते।
शरीर के लिए बोओगे तो कटुता ही काटोगे...
“आगे! ऊपर! और भी ऊँचे!”
उमंग से भरे युवावस्था के दिनों में,
नए सपनों को खोजने और पूरा करने के साथ।
विनम्र हृदय अधिक आँसू रोक सकता है,
जीवन की सारी बुद्धि और इच्छाशक्ति से भी।
वही जीतता है, जो सुनता है...
“आगे! ऊपर! और भी ऊँचे!”
–ली रूफेनर द्वारा
मैं उस लक्ष्य की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह पुरस्कार पाऊँ, जिसके लिए परमेश्वर ने मसीह यीशु में
ऊपर की बुलाहट दी है –फिलिप्पियों 3:14।


