# दरार में खड़ा एक मनुष्य

विश्वासयोग्य धीरज

भाषा: hi  
लेखक: Lee Rufener  
Athens, WI  
मूल अंक: The Heartbeat of The Remnant, वसंत 2019, संख्या 1  
मूल पृष्ठ: 13–15  
लेख पढ़ें: <https://remnant.truechristian.church/hi/मसीही-जीवन/दरार-में-खड़ा-एक-मनुष्य/>
मूल PDF: Spring\-2019\-Remnant\.pdf
[The Heartbeat of The Remnant, वसंत 2019](<https://remnant.truechristian.church/hi/issues/heartbeat-remnant-2019-spring/>)

*“मैं ने उनके बीच ऐसा मनुष्य ढूँढ़ा, जो बाड़े की मरम्मत करे और देश के लिये मेरे सामने दरार में खड़ा हो, ताकि मैं उसे नाश न करूँ; परन्तु मुझे कोई न मिला।” –यहेजकेल 22:30*

जब हम इस पद पर विचार करते हैं, तो उस छोटे डच लड़के की कहानी याद आती है जिसने बाँध के छेद में वीरतापूर्वक अपनी उँगली डाल दी थी। कटाव के डर से वह उस जगह को छोड़ नहीं सकता था, इसलिए वह पूरी लंबी रात वहीं प्रतीक्षा करता रहा, जब तक कि सुबह कोई आकर उसे उसकी दुर्दशा से बचाने न आ गया। आवश्यकता पड़ने पर अनेक पुरुषों ने आवेग में अद्भुत कार्य किए हैं। किसी के आवश्यक भूमिका निभाने से जीवन बचाए गए, नगर बचाए गए और शत्रु पराजित हुए। जिनके उपकार ने हमें प्रभावित किया है, उनके सम्मान में पुस्तकें लिखी जाती हैं और स्मारक खड़े किए जाते हैं। इन्हें इतिहास के नायक माना जाता है और इनके दृढ़ साहस तथा अटल निष्ठा के लिए इन्हें याद किया जाता है।

लेकिन जीवन की दरारें हमेशा इतनी स्पष्ट नहीं होतीं और उनके परिणामों को हमेशा मापा नहीं जा सकता। सुलैमान हमें इस घटना का वर्णन देता है: *“एक छोटा नगर था, और उसमें थोड़े ही मनुष्य रहते थे; और उस पर एक बड़ा राजा चढ़ आया, और उसे घेरकर उसके विरुद्ध बड़े\-बड़े मोर्चे बाँध दिए। उस नगर में एक कंगाल बुद्धिमान पुरुष पाया गया, और उसने अपनी बुद्धि से उस नगर को बचा लिया; तौभी किसी ने उस कंगाल पुरुष को याद न रखा।” –सभोपदेशक 9:14\-15* बाइबल में परमेश्वर के लिए दरार में खड़े हुए भक्त पुरुषों के अनेक विस्तृत वर्णन हैं; फिर भी निस्संदेह अनगिनत अन्य लोग भी हैं जिन्होंने आत्मिक स्तर पर बड़ी बाधाओं पर विजय पाई, पर इस जीवन में उन्हें कोई मान्यता नहीं मिली।

समस्या इतनी नहीं है कि दरार में खड़ा होना हमारी क्षमता या आर्थिक सामर्थ्य से बाहर है, बल्कि वास्तविकता यह है कि अक्सर उस काम का कोई पदनाम, अभिषेक या मान्यता नहीं होती। इसे ऐसे स्वयंसेवकों द्वारा पूरा किया जाना है जिनमें पर्याप्त दूरदर्शिता और परवाह हो कि वे बाड़े की दरार भरने के एकमात्र उद्देश्य के लिए अपनी योजनाओं का त्याग कर सकें। यह काम अक्सर भौतिक क्षेत्र में नहीं, बल्कि आत्मिक क्षेत्र की सीमाओं के भीतर होता है। यद्यपि हमारे बीच कंगाल तो सदा रहते हैं और आत्मिक कुलीनता उन्हें सहायता देने के लिए झुकेगी, फिर भी हमें विचार करना चाहिए कि परमेश्वर के मन में शायद इससे अधिक है कि कोई रोटी की कतारें और सूप रसोई आयोजित करे। वह ऐसे मनुष्य को खोज रहा है जो “बैंगनी सिद्धांतों” का वस्त्र पहने हो, और तापमान बढ़ने पर भी उसे उतार न दे।

राजा दारा ने वह घातक फरमान हस्ताक्षर करके जारी किया था जिसका उद्देश्य दानिय्येल को सिंहों के साथ दोपहर के भोजन पर भेजना था। *“जब दानिय्येल को मालूम हुआ कि लेख पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, तब वह अपने घर गया; और उसकी अटारी की खिड़कियाँ यरूशलेम की ओर खुली थीं। वह दिन में तीन बार घुटने टेककर प्रार्थना करता और अपने परमेश्वर का धन्यवाद करता था, जैसा वह पहले भी किया करता था।” –दानिय्येल 6:10* प्रार्थना करने से पहले दानिय्येल के लिए खिड़की के पट बंद कर देना कितनी छोटी\-सी बात होती। लेकिन दानिय्येल अपने ऊँचे सरकारी पद पर उपस्थित रहकर दरार नहीं भर रहा था। दरार बाबुल में परमेश्वर\-भय मानने वाले गवाहों की कमी में थी। इसलिए स्वर्ग और पृथ्वी के बीच की दरार खुली खिड़की पर प्रार्थना करके भरी जानी थी, और इसके लिए उसने अपना “सीनेट का आसन” त्याग दिया।

![दानिय्येल खुली खिड़की के पास घुटने टेककर प्रार्थना कर रहा है, जबकि कई पुरुष देख रहे हैं](<https://remnant.truechristian.church/images/articles/08c717e6-5c69-433c-b04d-ab1957c20eb9-1.jpg>) 

दानिय्येल प्रार्थना करते हुए

इतनी सारी दरारें होने और उन्हें भरने के लिए इतने कम पुरुष होने का मूल कारण यह है कि हम अक्सर परिस्थितियों के बारे में अपने व्यक्तिगत, सांसारिक दृष्टिकोण को परमेश्वर के अनन्त उद्देश्यों के साथ गड्डमड्ड कर देते हैं। हम अच्छी बातों में व्यस्त रहते हैं और अपने आपको काफी उपयोगी महसूस करते हैं। मरियम अनन्त बात में बैठी थी, जबकि मार्था उस आसन्न कमी को भरने में जोश से लगी थी जिसे वह घर में देख रही थी। व्यस्त जीवन की गतिविधियों के जाल में फँस जाना बेहद आसान है। हम सीढ़ी के शीर्ष तक कुशलता से पहुँचने के लिए बहुत परिश्रम कर सकते हैं, और अंत में पता चले कि वह गलत दीवार से लगी है। बहुत\-से लोग अत्यन्त व्यस्त हैं, पर बहुत प्रभावशाली नहीं। अनेक लोगों ने वर्षों तक प्रभु के काम में परिश्रम किया, लेकिन मंज़िल पर पहुँचकर उन्हें एहसास हुआ कि जो बातें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण थीं, वे उनके हाथ से निकल गई थीं। कुछ लोगों ने दूसरों की सेवा में अपना जीवन लगाया, पर अपने विवाह को कष्ट सहने दिया या अपने बच्चों को उनका अनादर करने दिया। दूसरों ने अपने माता\-पिता के साथ अपने संबंध की उपेक्षा करते हुए अपनी कलीसिया को “कॉर्बान” अर्पित किया।

दरार में खड़े मनुष्य को बुद्धिमान होना चाहिए, और बुद्धि को यह समझना चाहिए कि असली दरार कहाँ है। इसमें हमें एक निश्चित बाइबिल\-आधारित दृष्टि से प्रेरित होना चाहिए। जीवन हमें अपना मार्ग छोड़ने के अनेक अवसर देगा। यदि हम अपने परिवार, मित्रों, साथियों, कलीसिया की योजनाओं और जीवन की परिस्थितियों द्वारा हमसे की गई अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्रियता से जुट जाएँ, तो हम बाइबिल के सिद्धांतों के बजाय लोगों से संचालित होंगे। ऊपर से यह उचित लग सकता है, लेकिन हम स्वयं को गलत रस्सी के सिरे पर लटका हुआ पाकर कड़वी निराशा का अनुभव कर सकते हैं।

तो, परमेश्वर की चिंता की दरार कैसी दिखती है? कुछ लोग कहेंगे कि जहाँ कहीं भी कोई आवश्यकता उत्पन्न हो, वही यह दरार है। हमारे बीच कंगाल तो सदा रहते हैं और निश्चय ही यह भलाई करने का अवसर है। लेकिन मरियम ने जो *उत्तम भाग* चुना था, उसका कंगालों की सहायता करने या भूखों को भोजन कराने से कोई लेना\-देना नहीं था। इसी तरह, बहुमूल्य *जटामांसी के इत्र की अलबास्टर की डिबिया* वाली स्त्री उसे बेचकर उसकी कीमत से कंगालों की काफी समय तक सहायता कर सकती थी। लेकिन **असली** दरार अपाहिज को सहलाने से नहीं, बल्कि मसीह को मुकुट पहनाने से भरी जा सकती थी। अदन की वाटिका में कोई दरार नहीं थी, क्योंकि मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता के साथ पूर्ण सामंजस्य में चलता था। पाप ने ही दरार पैदा की और संबंध को बिगाड़ा। समय के अंत में भी कोई टूटन नहीं होगी, जब मेम्ना अपनी दुल्हन को ग्रहण करेगा। तब तक एक बड़ी दरार मौजूद है, क्योंकि यह पृथ्वी अपने सृष्टिकर्ता की महिमा करने से इनकार करती है। उस दरार में खड़ा होना उन सबका मुख्य उद्देश्य होना चाहिए जो उसका नाम धारण करने की आकांक्षा रखते हैं।

इसके लिए परमेश्वर के साथ हमारे संबंध में पूर्ण परिवर्तन आवश्यक है। मसीह के लहू का प्रायश्चित न्यायिक रूप से इसे संभव बनाता है। पवित्र आत्मा का दिलासा इसे भावनात्मक रूप से संतोषजनक बनाता है, लेकिन परमेश्वर के प्रति हमारे समर्पण और उसकी महिमा करने के क्षेत्र में ही यह दृश्य जीवंत होता है। उड़ाऊ पुत्र उस प्राण का प्रमुख उदाहरण है जिसने अपने पिता का पुत्र होने के नाते अपने पद को त्यागकर अपने ऊपर संसार भर की मुसीबत मोल ली थी। उसकी बहाली का मूल केवल उस पिता\-पुत्र के संबंध को फिर से स्थापित करना था जो उसके जन्म से ही मौजूद था।

मुझे लगता है कि परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं खोज रहा जो हाथ हवा में लहराते हुए चिल्लाएँ, “मैं यहाँ हूँ, मुझे भेज\!” बल्कि उसकी दृष्टि ऐसे नम्र प्राणों को खोजती है जो सर्वशक्तिमान के सामने अपनी इच्छा झुकाते हैं और स्वीकार करते हैं: *“हे हमारे प्रभु और परमेश्वर, तू महिमा और आदर और सामर्थ्य पाने के योग्य है; क्योंकि तू ही ने सब वस्तुएँ सृजीं, और वे तेरी ही इच्छा से थीं और सृजी गईं।” –प्रकाशितवाक्य 4:11* उन ***स्केवा के पुत्रों*** की कोई कमी नहीं, जो कल्पना करते हैं कि जिस “यीशु” के बारे में उन्होंने सुना है, उसका प्रचार करने की उनकी तत्परता से वे कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 1997 में, “दरार में खड़े होने” की विषयवस्तु के प्रत्युत्तर में लगभग 800,000 पुरुष वॉशिंगटन डी\.सी\. में प्रॉमिस कीपर्स की सभा में पहुँचे। हो सकता है कि इन पुरुषों के इरादे अच्छे रहे हों और वे उस राष्ट्र के सामने परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना चाहते हों जो अपने आत्मिक आधारों से तेज़ी से दूर जा रहा था, लेकिन केवल इच्छुक मन पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर को किसी बड़े जनसमूह की आवश्यकता नहीं कि उसे किसी छेद में ठूँस दिया जाए। वह योग्य पुरुषों को खोज रहा है, और बहुत कम लोगों को ऐसे पद तक पहुँचाया गया है।

यदि परमेश्वर बस इतना चाहता कि पुरुष किसी सभा में आएँ या सड़कों पर सार्वजनिक रूप से अपने विश्वास की घोषणा करें, तो निस्संदेह उसे ऐसे अनेक लोग मिल जाते जो यह अच्छा काम करना चाहते। लेकिन परमेश्वर और संसार के बीच दरार में खड़े होने की अनुमति केवल उन्हीं को परमेश्वर देगा जो वहाँ खड़े होने के योग्य हैं। मनुष्य का सार्वभौमिक घमंड उसे यह विश्वास दिलाता है कि उसे बस उपयोगी बनने की इच्छा करनी है, और फिर उसका उपयोग किया जाएगा। परमेश्वर के घर में कुछ पात्र आदर के लिए और कुछ अनादर के लिए हैं; फिर भी आदर के स्थान के **योग्य** होना, उस स्थान की **इच्छा** करने से कहीं कठिन है।

आजकल ऐसे संदेश वाले पत्र मिलना बहुत आम है: “वह श्रेय पाएँ जिसके आप योग्य हैं।” यह कोई रहस्य नहीं कि अनेक लोग जितने श्रेय के योग्य हैं, वह शून्य है। लेकिन हम सब इस अवचेतन संदेश से प्रभावित हुए हैं कि हर कोई श्रेय का हकदार है। हमारा समाज यह बढ़ावा देता है कि सारे अनैतिक, अविवेकी और दूरदर्शिताहीन लोग उतनी ही देखभाल के अधिकारी हैं जितनी नैतिक और परिश्रमी लोग। यदि आलसी व्यक्ति अच्छे वेतन का और फिजूलखर्च व्यक्ति आर्थिक सुरक्षा का हकदार है, तो प्रेरित पौलुस को कलीसिया से सहायता पाने वाली विधवाओं के लिए कोई योग्यता रखने का अधिकार ही नहीं है। न ही उसे किसी निष्कपट प्राण को बिशप का पद चाहने पर केवल इसलिए अस्वीकार करने का अधिकार है कि वह योग्यताएँ पूरी नहीं करता। लेकिन परमेश्वर ने सारदीस में कुछ लोगों को देखा *“जिन्होंने अपने वस्त्र अशुद्ध नहीं किए; वे श्वेत वस्त्र पहिने हुए मेरे साथ घूमेंगे, क्योंकि वे इस योग्य हैं।” –प्रकाशितवाक्य 3:4*

ये दरार में खड़े पुरुष हैं। इसलिए नहीं कि उनके पास ऊर्जा खर्च करने के लिए बहुत थी, बल्कि इसलिए कि उनके पास पवित्रता की दृष्टि थी। यह महज़ संयोग नहीं था, क्योंकि जो पुरुष परमेश्वर के साथ श्रेष्ठता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें ऐसा करना होगा…

### …उद्देश्य

*“विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इनकार किया। उसने थोड़े दिन के सुख भोगने की अपेक्षा परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना अधिक पसन्द किया। उसने मिस्र के भण्डार से बड़ा धन मसीह के निमित्त निन्दित होने को समझा, क्योंकि उसकी दृष्टि प्रतिफल पाने पर लगी थी। विश्वास ही से उसने राजा के क्रोध से न डरकर मिस्र को छोड़ दिया; क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ धीरज धरता रहा।” –इब्रानियों 11:24\-27*

परमेश्वर के काम के लिए सच्ची दृष्टि की एक कीमत होती है। धनवान जवान अधिकारी मसीह के राज्य में भी और अपनी संपत्ति पर भी शासक बनना चाहता, लेकिन वह दोनों को एक साथ थाम नहीं सकता था। यह सिद्धांत उसके और ऐसे नेक काम की इच्छा रखने वाले हर व्यक्ति के लिए पहली बाधा बना। जवान होने पर मूसा ने अपना निर्णय लिया और अपनी निष्ठा चुनी। वह मिस्र द्वारा ठुकराए जाने के लिए तैयार था, लेकिन उसने कभी नहीं सोचा था कि उसके अपने लोग भी उसे इतनी बेरुखी से त्याग देंगे।

एकाकी भट्ठी में बिताए चालीस वर्षों ने उसका घमंड गलाया और उसके कौशल को तराशा। वहाँ उसने मौन के धार्मिक विद्यालय से शिक्षा पूरी की और पृथ्वी पर सबसे नम्र मनुष्य के रूप में दरार में खड़े होने के लिए तैयार और सुसज्जित हुआ। वह मनुष्यों की ओर से परमेश्वर के सामने मध्यस्थ बना। मनुष्यों और परमेश्वर के पक्ष\-समर्थक के रूप में उसने प्रचार किया और प्रार्थना की, चला और रोया; उसने अपने परमेश्वर और अपने भाइयों के लिए जीवन बिताया और उनसे प्रेम किया। इस सबके दौरान वह स्वयं को उस पद के अयोग्य मानता रहा। इस्राएल की सन्तानें उसके हृदय के केंद्र में थीं, फिर भी उसका भय और ध्यान कभी उसके परमेश्वर से नहीं हटा। जब हम मनुष्यों से आदर पाने की कोशिश करते हैं, तो हमारा उद्देश्य धुँधला पड़ जाता है और दरार में हमारा स्थान छिन जाता है। बहुत\-से अच्छे पास्टरों, माता\-पिताओं और तीर्थयात्रियों ने यह गलती की है और अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने मित्रों या अपनी कलीसिया से अपनी दिशा तय करवाई है। शायद यह प्रेमपूर्ण, परवाह करने वाला और सबसे आदरपूर्ण काम लगे। लेकिन परमेश्वर पूर्ण निष्ठा की माँग करता है और कोई समझौता नहीं हो सकता। एक मनुष्य “क्या बनना चाहता है,” यह उसके दूरदर्शी उद्देश्य से संचालित होता है; लेकिन वह “अंततः क्या बनता है,” यह उसकी…

### …प्राथमिकताएँ

*“यह बात सच है, कि यदि कोई बिशप होना चाहता है, तो वह भले काम की इच्छा करता है। इसलिए बिशप को निर्दोष, एक ही पत्नी का पति, संयमी, सुशील, अतिथि\-सत्कार करनेवाला, और सिखाने में निपुण होना चाहिए। वह पियक्कड़ या मारपीट करनेवाला न हो; वह कोमल हो, झगड़ालू न हो, और लोभी न हो। वह अपने घर का अच्छा प्रबन्ध करनेवाला हो, और उसके बाल\-बच्चे पूरी गम्भीरता के साथ उसके अधीन हों।” –1 तीमुथियुस 3:1\-4* हमारा उद्देश्य हमारी मंज़िल बनाता है, लेकिन वहाँ पहुँचने का रास्ता हमारी प्राथमिकताएँ तैयार करती हैं।

दुर्भाग्य से, कुछ पुरुषों को लोकप्रिय राय के आधार पर सेवकाई में आगे बढ़ाया जाता है, लेकिन परमेश्वर अपने पुरुषों को उनकी प्राथमिकताओं और अनन्त योग्यताओं के आधार पर चुनता है। जो पुरुष अपनी संपत्ति, लालसाओं या पद से संचालित होते हैं, वे परमेश्वर के उद्देश्य की सेवा के लिए अनुपयोगी होंगे। उन्हें पास्टर, रेवरेंड या फादर कहलाना अच्छा लगता है। उन्हें जोशीला, ज्ञानी, दृढ़ या करुणामय समझा जाना अच्छा लगता है। *“क्या अब मैं मनुष्यों को मनाता हूँ या परमेश्वर को? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूँ? यदि मैं अब तक मनुष्यों को प्रसन्न करता रहता, तो मसीह का दास न होता।” –गलातियों 1:10 ए\.एस\.वी\.*

सौभाग्य से, परमेश्वर किसी का पक्षपात नहीं करता, और दीवार के योग्य पत्थर रास्ते में पड़ा नहीं छोड़ा जाएगा। बूढ़े, कंगाल, अपंग और लँगड़े—सभी दरार भरने के पद के लिए उत्तम उम्मीदवार हैं। टूटे हुए सपनों, टूटे हुए शरीरों और टूटे हुए दिलों वाले लोग नूह, इब्राहीम, यूसुफ, मूसा, दानिय्येल, एस्तेर, रूत और अनगिनत अन्य लोगों के साथ बाड़े में बिना किसी बाधा के खड़े हो सकते हैं। ये सब इस संसार के सामने परमेश्वर के उत्कृष्ट प्रतिनिधि हैं। इन्होंने तुच्छता, प्रसिद्धि, दुनियावी मेल\-जोल और धन\-संपत्ति से मुँह मोड़ लिया और स्वर्ग के नायक बन गए। वे बाड़े में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं और “अनन्त के दूतावास” का निर्माण करते हैं। जब दूसरे घृणा करते थे, तब उन्होंने प्रेम किया। जब दूसरे लेते थे, तब उन्होंने सब कुछ दे दिया। उनका उपहास किया गया और उन्हें गलत समझा गया, उनकी निन्दा और खिल्ली उड़ाई गई, वे थके और रोते रहे।

*“क्योंकि हम उद्धार पानेवालों और नाश होनेवालों के बीच परमेश्वर के लिये मसीह की सुगन्ध हैं। कितनों के लिये तो मरने के लिये मृत्यु की गन्ध, और कितनों के लिये जीवन के लिये जीवन की सुगन्ध। और इन बातों के योग्य कौन है?” –2 कुरिन्थियों 2:15\-16* वे लोग जिनका एकमात्र उद्देश्य और प्राथमिकताएँ परमेश्वर के अधीन हैं।

<aside class="translation-notice" data-translation-notice="ai" lang="hi" dir="ltr" role="note">
  <p>इस लेख का अनुवाद OpenAI (मॉडल: gpt-6-luna) द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से किया गया है और अभी इसकी मानवीय समीक्षा नहीं हुई है। अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक संस्करण है। अर्थ के बारे में संदेह होने पर कृपया अंग्रेज़ी मूल पाठ देखें। <a href="/en/christian-living/a-man-in-the-gap/" data-source-article-id="08c717e6-5c69-433c-b04d-ab1957c20eb9" hreflang="en">अंग्रेज़ी मूल पाठ</a></p>
</aside>
