हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता, यीशु मसीह के योग्य नाम में नमस्कार। मुझे विश्वास है कि दुनिया की वर्तमान अनिश्चितताओं के बीच हमारे हृदय भजनकार के इन शब्दों से गूँजते हैं: मेरा उद्धार और मेरी महिमा परमेश्वर से है; मेरी सामर्थ्य की चट्टान और मेरा शरणस्थान परमेश्वर है –भजन संहिता 62:7। और, परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलनेवाला सहायक –भजन संहिता 46:1।
हम अभूतपूर्व और चुनौतीपूर्ण समय का सामना कर रहे हैं—ऐसा समय, जैसा हममें से बहुतों ने अपने जीवनकाल में नहीं देखा। मुझे यकीन है कि हर पीढ़ी ने अपने ऐतिहासिक समय के लिए अनूठी चुनौतियों का सामना किया है। हमारे साथ भी यही सच है। लेकिन इतिहास में हमारा ‘समय’ कौन-सा है? परमेश्वर का भय माननेवाले अधिकांश लोग मानते हैं कि हम उस दहलीज़ पर हैं जिसे पवित्रशास्त्र “अन्त के समय” कहता है। (देखें दानिय्येल 8:17; 11:35; 11:40; 12:4; और 12:9)
शायद यह सिर्फ़ मुझे लगता है, या शायद इसका बहुत कुछ लेना-देना है कि आजकल दुनिया भर में समाचार कितनी तेज़ी से प्रसारित होते हैं। लेकिन सचमुच ऐसा लगता है कि पाँच या दस साल पहले की तुलना में अब कहीं अधिक अव्यवस्था और प्रकृति की हिंसक घटनाएँ हैं। तूफ़ान, बवंडर, जंगलों की आग, भूकंप, सूखा, बाढ़, राजनीतिक अशांति, युद्ध और युद्ध की अफ़वाहें। क्या मैं कुछ भूल गया? ओह हाँ, दुनिया भर में फैली महामारी—कोविड-19—का लगातार बना रहनेवाला मुद्दा भी है।
आज दुनिया के बहुत-से लोगों को लगता है कि “कुछ तो हो रहा है”, या “कुछ होनेवाला है”। हमें इससे हैरान नहीं होना चाहिए; यीशु ने इसकी भविष्यवाणी की थी। हमें भय से अभिभूत होकर अपना ध्यान भटकने नहीं देना चाहिए; यीशु ने हमें बताया है कि क्या करना है। आगे दिए गए पवित्रशास्त्र के वचन में मैंने तीन बातें रेखांकित की हैं जिन्हें करते रहने की यीशु हमसे अपेक्षा करते हैं, जब तक समय बना हुआ है।
यीशु ने उत्तर देकर उनसे कहा, सावधान रहो कि कोई तुम्हें धोखा न दे। क्योंकि बहुत से लोग मेरे नाम से आकर कहेंगे, ‘मैं मसीह हूँ,’ और बहुतों को धोखा देंगे। तुम युद्धों और युद्ध की अफ़वाहों के बारे में सुनोगे; देखो, घबरा न जाना, क्योंकि इन सबका होना अवश्य है, परन्तु अन्त अभी नहीं है। क्योंकि जाति पर जाति और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा, और जगह-जगह अकाल पड़ेंगे, महामारियाँ फैलेंगी और भूकंप होंगे। ये सब पीड़ाओं का आरम्भ हैं। तब वे तुम्हें क्लेश देने के लिए सौंपेंगे और तुम्हें मार डालेंगे; और मेरे नाम के कारण सब जातियाँ तुमसे बैर रखेंगी। तब बहुत-से लोग ठोकर खाएँगे, और एक दूसरे को पकड़वाएँगे और एक दूसरे से बैर रखेंगे। बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे और बहुतों को धोखा देंगे। अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठंडा पड़ जाएगा। परन्तु जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा। और राज्य का यह सुसमाचार सारे संसार में सुनाया जाएगा कि सब जातियों पर गवाही हो; तब अन्त आ जाएगा –मत्ती 24:4-14।
सावधान रहो कि कोई तुम्हें धोखा न दे
मुझे यह बात रोचक लगती है कि यीशु हमें यह बताने से पहले इसका ज़िक्र करते हैं कि वे हमसे क्या करना चाहते हैं। किसी ने कहा है कि आत्मिक अंधापन शारीरिक अंधेपन से इस मायने में अलग है कि जब कोई शारीरिक रूप से अंधा होता है, तो उसे इसका पता होता है; लेकिन जब कोई आत्मिक रूप से अंधा होता है, तो उसे इसका पता नहीं होता। दरअसल, आत्मिक अंधेपन की बुनियाद यही है—अपनी ही आत्मिक दशा के प्रति सजग न रहना।
हमें किन-किन बातों से धोखा हो सकता है? कौन-कौन हमें धोखा देने की कोशिश कर सकता है? हमेशा याद रखें कि शैतान जिसे भी और जिस भी तरह से इस्तेमाल कर सकता है, उतने अधिक लोगों को धोखा देने के लिए ऐसा करना चाहता है। अय्यूब के मित्र उसके विरुद्ध हो गए, और उसकी अपनी पत्नी ने भी निकलने का रास्ता बताने के लिए शैतान के ही शब्द कहे (देखें अय्यूब 1;11; 2:5; और 2:9)। अगर हम खुद को ऐसी ही परिस्थितियों में पाएँ, तो हमें हैरान नहीं होना चाहिए; मसीह ने पहले ही बता दिया था कि ऐसा होगा (देखें मत्ती 10:35-36; और लूका 12:53)।
आइए, यह कभी न भूलें कि परमेश्वर ने हमें धोखे में पड़ने से बचने के लिए कुछ स्पष्ट उपाय दिए हैं, जिन पर हम चल सकते हैं। हे भाइयो, चौकस रहो कि तुममें ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाए। बल्कि प्रतिदिन एक दूसरे को समझाते रहो, जब तक आज का दिन कहा जाता है; ऐसा न हो कि तुममें से कोई पाप के छल में पड़कर कठोर हो जाए। क्योंकि हम मसीह के सहभागी हुए हैं, यदि हम अपने भरोसे को आरम्भ से अन्त तक दृढ़ता से थामे रहें; जब कहा जाता है, ‘आज यदि तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मनों को कठोर न करो,’ जैसा कि विद्रोह के समय हुआ था –इब्रानियों 3:12-15।
अन्त तक धीरज धरो
जब भी इस बात पर गरमागरम चर्चा होती है कि क्या एक बार उद्धार पा चुका व्यक्ति हमेशा उद्धार पाया हुआ रहता है और इसलिए कभी उद्धार से वंचित नहीं हो सकता, तो यह उन पवित्रशास्त्र के वचनों में से एक है जिनके बारे में मैं सोचता हूँ। क्या पवित्रशास्त्र हमें यह आश्वासन नहीं देता कि …ताकि तुम जानो कि तुम्हें अनन्त जीवन मिला है… –1 यूहन्ना 5:13। फिर भी, पतरस हमें कहता है कि …सावधान रहो कि अधर्मियों के भ्रम में पड़कर अपनी दृढ़ता से हाथ धो न बैठो –2 पतरस 3:17।
तो पवित्रशास्त्र की बातों में सामंजस्य बैठाने के लिए हम इन्हें कैसे समझें? पहली बात, हमें आरम्भ में उद्धार पाना ज़रूरी है, ताकि हमें अनन्त जीवन मिले, जो परमेश्वर के वचन का आज्ञापालन करते हुए चलने की सामर्थ्य देता है। दूसरी बात, जब तक हम पवित्रशास्त्र के आज्ञापालन में चलते रहते हैं, तब तक हम उद्धार पाए रहते हैं। और अन्त में, यदि हम जीवन भर विश्वासयोग्यता से, अन्त तक धीरज धरें (यहाँ पृथ्वी पर हमारे जीवन के अन्त तक), तो हमारा सदा के लिए उद्धार होता है।
सारे संसार में सुसमाचार सुनाओ
सुसमाचार सुनाएँ? हाँ। शायद हम सभी स्वयं प्रचार न कर सकें, लेकिन इस आज्ञा को पूरा करने में कलीसिया की मदद के लिए हम सब अपना-अपना योगदान दे सकते हैं। कुछ लोगों को परमेश्वर ने अपने प्रार्थना-कक्ष में घंटों तक सच्चे मन से मध्यस्थता की प्रार्थना करने के लिए ठहराया है। कुछ लोगों को अपनी आर्थिक सहायता देने के लिए बुलाया गया है, ताकि वे उन लोगों का समर्थन करें जिन्हें सुसमाचार प्रचार की अग्रिम पंक्ति में रहने के लिए चुना गया है। यह सबका मिलाजुला प्रयास है। पूरी कलीसिया एक साथ मिलकर काम करती है—हर स्थानीय कलीसिया अपना हिस्सा निभाती है और हर व्यक्ति अपना व्यक्तिगत योगदान देता है।
आइए, अपने आस-पास की अव्यवस्था और भ्रम को अपना ध्यान भटकाने और हमें दिशाहीन करने न दें। आइए, एक साझा लक्ष्य के लिए भाई-बहनों के रूप में मिलकर काम करें—धोखे में न पड़ना, अन्त तक धीरज धरना और सारे संसार में सुसमाचार सुनाना।
अब जो तुम्हें गिरने से बचा सकता है, और अपनी महिमा के सामने तुम्हें निर्दोष और बड़े आनन्द के साथ खड़ा कर सकता है, उस एकमात्र बुद्धिमान परमेश्वर, हमारे उद्धारकर्ता की महिमा, प्रताप, प्रभुता और अधिकार युगानुयुग बना रहे। आमीन। –यहूदा 1:24-25।


